पीयूएसएल, दिल्ली 20 और 21 सितंबर को नई दिल्ली में सांप्रदायिक सद्भावना के मुद्दे पर दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस का आयोजन कर रही है।
पीयूसीएल की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार “सांप्रदायिक सद्भावना: नफरती बयानबाजी और नफरती अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए” विषय पर इस सम्मेलन के आयोजन का उद्देश्य हमखयाल संस्थाओं की एक एक्शन कमेटी बनाना भी है जो सांप्रदायिक सद्भावना को बढ़ावा देने और नफरती बयानबाजी और नफरती अपराधों पर अंकुश लगाने की दिशा में काम करेगी।
पीयूसीएल के जारी एक बयान के अनुसार देश में नफरती अपराधों और नफरती बयानबाजी के बढ़ते मामलों के कारण इनकी रोकथाम के लिए और सांप्रदायिक सद्भावना को बढ़ावा देने के लिए नई सोच की जरूरत है। समुचित कानूनी सुधार, वर्तमान कानूनों का नियमित पालन और भारतीय संविधान के समानता और धर्मनिरपेक्षता सिद्धांतों के प्रति निष्ठा का पारंपरिक विचार प्रासंगिक तो है लेकिन इधर काफी नहीं हैं, खासकर, यह देखते हुए कि आज राज्यसत्ता सक्रिय रूप से सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने में लगी है।
सांप्रदायिक सद्भावना न सिर्फ देश की एकता व अखंडता के लिए ज़रूरी है बल्कि देश तरक्की करे, इसके लिए भी अपरिहार्य है।
पीयूसीएल ने सांप्रदायिक सद्भावना के प्रसार में राजनीतिक दलों की भूमिका को रेखांकित करते हुए धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के प्रसार और नफरती बयानबाजी व अपराधों का मुकाबला करने के लिए राजनीतिक दलों को जोड़ने हेतु तरीके व रास्ते खोजने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
पीयूसीएल के अनुसार सांप्रदायिकता की समस्या से निबटने में न्यायपालिका की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। हालांकि दुर्भाग्यपूर्ण है कि न्यायपालिका भी, सभी स्तरों पर, इस वायरस से संक्रमित है। कई न्यायिक अधिकारी हैं जो धर्म के आधार पर निर्णय दे रहे हैं और खुलेआम विकृत बातें कहते हैं और उन्हें न्यायिक व्यवस्था के शीर्ष से कोई फटकार भी नहीं लगाई जाती।
यही सब देखते हुए यह कॉन्फ्रेंस की जा रही है।
(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)